2 सितम्बर हर साल विश्व नारियल दिवस World Coconut Day के रूप में मनाया जाता है। इसकी शुरुआत कब,कैसे और क्यों हुई, आइये जानते हैं ~
- विश्व नारियल दिवस सबसे पहले 2 सितम्बर 2009 को मनाया गया था।
- इसी दिन एशिया प्रशांत नारियल समुदाय Asia Pacific Coconut Community APCC की स्थापना हुई थी। इसीलिए विश्व नारियल दिवस के लिए 2 सितम्बर को चुना गया। APCC 18 सदस्य देशों का एक संगठन है जिसका उद्देश्य नारियल की खेती को बढ़ावा देना व अधिक पैदावार के लिए रिसर्च करना है।
भारत में नारियल उत्पादन -
भारत दुनिया का दूसरा सर्वाधिक नारियल उत्पादक देश है।(पहले स्थान पर इंडोनेशिया है)। देश का 90% नारियल केरल,कर्नाटक, तमिलनाडु व आंध्र प्रदेश में पैदा होता है। डेढ़ करोड़ नारियल तो अकेले केरल में ही पाए जाते हैं और इसी वजह से केरल को "कोकोनट लैंड" कहते हैं। महाराष्ट्र में मुम्बई व तटीय क्षेत्रों तथा गोआ में भी इसकी उपज होती है। नारियल को बांग्ला भाषा में नारिकेल या नारकोल कहा जाता है।
नारियल के विभिन्न उपयोग -
इस वृक्ष का कोई ऐसा हिस्सा नहीं है जो हमारे काम न आता हो।
"स्वर्ग का पेड़" की उपाधि नारियल को इसके गुणों के कारण ही मिली है। भारत में इसे "श्रीफल"कहा जाता है। हर शुभ कार्य में जल युक्त नारियल भगवान को अर्पण किया जाता है व इसकी गिरी प्रसाद स्वरूप भक्त गण खाते हैं। इसके फल का पानी मरीजों के लिए अमृत-तुल्य है। नारियल में मौजूद पौषक तत्व ,शरीर में पानी की कमी को पुरा करता है। नारियल के फल को खाद्य एवं तेल के रूप में उपयोग में लिया जाता है। नारियल का बाहरी कड़ा आवरण या छिलका कई औद्योगिक कार्यों में कच्चे माल के रूप में काम आता है। इसके फल की छिलकों से कई प्रकार के सजावटी सामान बनाये जाते हैं जिनकी पूरे विश्व में अच्छी-खासी मांग है।
पेड़ की लकड़ी फर्नीचर, नाव और कोयला बनाने के काम मे ली जाती है।
नारियल का वृक्ष अत्यंत सुंदर होता है। इसके शिखर पर पत्ते होते हैं जिनकी लम्बाई 20 फीट तक भी हो सकती है। ये विशाल पत्तियां देश के दक्षिणी राज्यों खासकर केरल में भोजन परोसने व वैवाहिक कार्यों में सजावट के लिए काम आते हैं। केले के पत्तों के साथ-साथ नारियल के पत्ते भी शुभ कार्य में एक अनिवार्य भाग है। इसके अलावा नारियल के पत्तों से टोकरियां, चटाई,एवं अन्य कई तरह की सामग्री बनाई जाती है। केरल के अधिकांश लोगों की तो आजीविका नारियल के वृक्षों पर ही निर्भर है।
भारतभर में नारियल का तेल बालों व त्वचा को नमी प्रदान करने हेतु इस्तेमाल किया जाता है। नारियल के तेल के निरंतर उपयोग से बाल घने, काले व लम्बे होते हैं तथा तेल की मालिश से त्वचा चमकदार और झुर्रियों-रहित बनती है। सौंदर्य-प्रसाधन के निर्माण में नारियल का तेल एक अहम रोल निभाता है।
केरल में रोज का भोजन नारियल के तेल में बनाने की प्रथा है। सब्जियों, चटनी व पकवानों में भी नारियल की गिरी उपयोग में ली जाती है।
नारियल का वृक्ष -
नारियल का वैज्ञानिक नाम COCOS NUCIFERA है और यह palm जाति का एक बीजीय वृक्ष है।
यह समुद्र किनारे ज्यादा पाए जाते हैं, इनकी शाखाएं नहीं होती हैं।
कितने आश्चर्य की बात है कि नारियल का वृक्ष खारे पानी वाले समुद्र के किनारे ज्यादा बेहतर ढंग से विकसित होता है जबकि इसके फल के अंदर का पानी अत्यंत मीठा व मधुर स्वाद वाला होता है।
नारियल 80 वर्ष की आयु तक फल देता है। इसका पेड़ 60 से 100 फ़ीट तक ऊंचा होता है। इसकी बढ़वार खारे पानी की बहुतायत वाले क्षेत्रों में ज्यादा होती है। इसीलिए नारियल के वृक्ष समुद्र के किनारे पाए जाते हैं। हर साल इसके एक पेड़ से 70 से 100 फल प्राप्त किये जा सकते हैं।
नारियल के वृक्ष अधिकतर समुद्र के किनारे ही क्यों पाए जाते हैं ?
नारियल के फल में एक विशेषता होती है। यह 100 से 120 दिनों तक भी समुद्र के पानी में तैरता हुआ 5,0000 कि मी. की दूरी सुरक्षित रूप से तय कर सकता है और अनुकूल मौसम में इसका बीज अंकुरित हो कर नए वृक्ष में परिवर्तित हो जाता है। समुद्र, नारियल जाति के फलने-फूलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसीलिए प्राकृतिक रूप से इसके वृक्ष अक्सर समुद्र किनारे बहुतायत से पाए जाते हैं।
नारियल का अंतरराष्ट्रीय महत्व -
बीसवीं सदी तक निकोबार द्वीप समूह पर सामान खरीदने हेतु नारियल के फलों की मुद्रा के रूप में प्रयोग किया जाता था। इटली के व्यापारी मार्को पोलो ने भारत यात्रा के दौरान जब नारियल को पहली बार देखा तो इसे "फेराओ नट" नाम दिया था।
नारियल एक पौष्टिक फल-
नारियल में मैंगनीज और आयरन दोनों काफी मात्रा में होते हैं। इसके साथ ही इसमें कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन भी पाया जाता है जो हमारी हड्डियों की मजबूती के लिए जरूरी है। नारियल की गिरी खाने से भोजन के पाचन में मदद, दांतों के स्वास्थ्य व गुड कोलेस्ट्रॉल बढ़ाने में सहायता मिलती है।

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